Sunday, 12 February 2017

पसायदान
( हिन्दी अनुवाद )
लेखक- संत ग्यानेश्वर महाराज 

आता विश्र्वात्मकें देवें । येणें वाग्यज्ञें तोषावें । 
तोषोनि मज द्यावें । पसायदान हें ।।

हे ईश्वर, मेरे साहित्ययज्ञ ‘ ज्ञानेश्वरी ’ ( ग्यानेश्वरी - हिन्दी ) से संतुष्ट होकर, मुझे आपका आशीर्वाद स्वरुप प्रसाद ( पसायदान ) दीजिए I

जे खळांची व्यंकटी सांडो । तया सत्कर्मी रती वाढो । 
भूतां परस्परें पडो। मैत्र जीवांचें ।।

दुष्ट लोगों की दुष्टता खत्म हो जाए I उन्हें सत्कर्म ( अच्छे काम/व्यव्हार ) करने की बुद्धि प्राप्त हो जाएI सभी जीवो में, एक दूसरे के प्रति मित्रत्व का भाव जागृत हो I

दुरिताचें तिमिर जावो । विश्र्व स्वधर्म सूर्यें पाहो । 
जो जें वांछील तो तें लाहो । प्राणिजात।।

बुरे लोगों के मन से पाप भावना का अंधकार मिट जाए I यह दुनिया, सभी जीवों का हित चाहनेवाले ‘मानव धर्म’ का सूर्य देखें I सभी जीवों को हर वह अच्छी चीज़ मिल जाए, जिसकी जीवों ने कामना की है I

वर्षत सकळ मंगळीं । ईश्वरनिष्ठांची मांदियाळी । 
अनवरत भूमंडळी । भेटतु या भूतां ।।

सभी प्रकार की मंगलता बरसाने वाले और ईश्वर के प्रति पूर्ण निष्ठा रखने वाले संत, पृथ्वी पर युगों-युगों तक जन्म लेते रहने चाहिए, साथ ही साथ उनका सानिध्य सभी जीवों को मिलना चाहिए I

चला कल्पतरूंचे रव । चेतना चिंतामणीचें गांव । 
बोलते जे अर्णव । पीयूषाचे ।।

संत कल्पतरु के चलते-फिरते बाग है I  (कल्पतरु - ऐसा वृक्ष, जो आपकी हर इच्छा पूर्ण करने की ताकत रखता है ) संत चेतनारूपी चिंतामणि रत्न के गांव है ( चिंतामणि रत्न - जो हर चिंता दूर करता है ) जो संत अपनी वाणी से ज्ञान का प्रसार करते हैं, वह ज्ञान, अमृत के समंदर के जैसा है, जो कभी खत्म नहीं होगा I



 

चंद्रमे जे अलांछन। मार्तंड जे तापहीन । 
ते सर्वांही सदा सज्जन । सोयरे होतु ।।

जो चंद्र की तरह शीतल और सुखकर होते हैं, पर उन पर चंद्र जैसे कोई दाग नहीं होते I
जो सूर्य की तरह जीवन से अंधेरे का नाश करते हैं, पर वह सूर्य की तरह का दाहक नहीं होते I
ऐसे सभी के साथ अच्छे रहने वाले संतसज्जनों का, सभी जीवों से प्यार का/दोस्ती का नाता बन जाए I  

किंबहुना सर्व सुखीं । पूर्ण होउनि तिहीं लोकीं ।
भजिजो आदीपुरुखी । अखंडित ।।

तिन्हों लोगों के ( स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक ) जीव, सुखों से परिपूर्ण होकर, उस ईश्वर की अखंड पूजा में/भक्ति में लीन होने चाहिए I


आणि ग्रंथोपजीविये । विशेषीं लोकीं ईयें । 
दृष्टा दृष्ट विजयें । होआवें जी ।।

और इस ग्रंथ को प्रमाण मानकर/जीवन मानकर सभी ने अपने दुष्ट प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त करना चाहिए I 

तेथ म्हणे श्रीविश्र्वेशरावो । हा होईल दानपसावो । 
येणेंवरें ज्ञांनदेवो । सुखिया जाला ।।

यह विश्व प्रार्थना सुनने के बाद, ग्यानेश्वर (ज्ञानेश्वर - मराठी ) जी के गुरु संत निवृत्तिनाथ, जो उनके बड़े भाई भी थे, उन्होंने ईश्वर की ओर से ग्यानेश्वर से कहा, “ विश्वकल्याण हेतु माँगा गया, तुम्हारा यह पसायदान ( प्रसाद ) तुम्हें जरूर मिलेगा ” यह सुनकर ग्यानेश्वर आनंदित हो गए I


संत ग्यानेश्वरजीं के इस प्यारी प्रार्थना का हिंदी मैं अनुवाद करने की बुद्धि मुझे ईश्वर ने प्रदान की, इसके लिए मैं दयालु ईश्वर का बहोत बहोत आभारी हूँ I   

अनुवादक- सुशांत शिंदे


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